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बुधवार, मई 17, 2017

न न, न न; न न, न न; 
मेरी बेरी के बेर, मत तोड़ो; 
कोई काँटा, चुभ जायेगा।
निषेध सदैव दुर्भावना पूर्ण नहीं होता। यह सही है कि, हमें नकारात्मक की बजाय सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। पर
पर नाराज़गी के डर से किसी की हाँ में हाँ मिलाना; यह तो चाटुकारिता कहलाती है। 
प्राणों के भय से जिस राजा का मंत्री, वैद्य और गुरु झूठ बोलें उस राजा के राज्य का; धर्म का और तन का अंत जान लेना चाहिए। 
सचिव बैद गुर तीनि जों प्रिय बोलिहिं भय आस 
राज धर्म तन तीनि कर बेगहिं होइहीं नास
   डर से, संकोच से, लालच से,हेकड़ी से  या फिर अनभिज्ञता से  भी कभी हम न की बजाय, हाँ , कह देते हैं ; तो कभी न कभी उसका खामियाजा भुगतना ही पड़ता है। न की बजाय हाँ कहना; न तो वीरता है, और न ही बुद्धिमानी। इसकी बजाय विनम्रता-पूर्वक न कह देना; निश्चय ही, हिम्मत, बुद्धिमानी  और दूर-दृष्टि है; जिससे भविष्य की कई पेचीदगियों और परेशानियों से बचा जा सकता है।
BE BOLD, IN; WHAT YOU STAND, FOR  !               1
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मंगलवार, दिसंबर 31, 2013

कल हो न हो

Wednesday, 31/12/2013
http://apnyvaani.blogspot.in/2013/12/blog-post_31.html
तीन बातों का असर मुझ पर गहरा हुआ  : -
1 - माँ-बाप का प्यार !
2 - बड़े मामा श्री वेदप्रकाश जी का अनुशासन !!
3 - फ़िल्में !!!
माँ-बाप ने मुझे कभी कोई कमी नहीं अखरने दी; गाँव के लोग अक्सर मेरे जूते, चप्पल और कपड़े नमूने के तौर पर देखने आते थे; 
कठोर परिश्रम, अनुशासन, मानवीय गुण और व्यापारिक अक़ल मैंने अपने बड़े मामाजी के अधीन रहकर 1970 से 1974के चार सालों में सीखी;
पहली फ़िल्म 1969 में जॉय मुकर्जी की 'हमसाया' रायसिंहनगर NEW-LIGHT CINEMA में चाचा मदनलाल जी के साथ,  R 1.20 में देखी . 1971से 1974 देहरादून, 1975-76जम्मू में,और फिर 1976 से 80तक रायसिंहनगर और श्रीगंगानगर में, खूब फ़िल्में देखीं; इस के बाद ये सिलसिला कम होता गया; अब तो साल में एक-दो शायद ही देख पाता हूँ;  
शुरू से आज तक जो भी फ़िल्में थीं, सबने कुछ न कुछ शिक्षा जरूर दी है; 
शायद ही कोई फ़िल्म हो, जिसने मुझे रुलाया न हो ! 
नव-वर्ष 2014 ईस्वी की पूर्व संध्या पर, सभी परम श्रद्धेय बुज़ुर्गों, मित्रों और सहृदयों को शुभ-कामनाएं ,

मंगल भवन अमंगल हारि !
द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारि !! 

सोचता हूँ; ज़िन्दगी यूँ ही गुज़रती रहे !
क़ाफ़िला यूँ ही चलता रहे !!
शायद, कल हो न हो  !!!
HAPPY WEDNESDAY, 2014
धर्म की जय हो ; अधर्म का नाश हो !
प्राणियों में सद्भाव हो; विश्व का कल्याण हो!!

जयहिंद جیہینڈ  ਜੈਹਿੰਦ  
Ashok, Tehsildar  Srivijaynagar  9414094991
www.apnykhunja.blogspot.com,
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शनिवार, सितंबर 07, 2013

शाबासी

चापलूसी और शाबासी का चोली-दामन का साथ है; डाण्ट या दण्ड उसी को मिलेगा जो काम करेगा, और उसमे खामी या विफलता हो जाये;  निकम्मेपन से डाण्ट या दण्ड के आसार काफी कम हो जाते हैं; 
गिरते हैं घुड़सवार ही मैदाने जंग में;
 گرتے ہیں، گھڈ-سوار ھی میدانے زنگ میں 
वो तुख्म क्या गिरें;;;;;
  وو تخم کیا گرے، 
जो घुटनों के बल चले हों; 
  جو گھٹنوں کے بل،  چلے ہوں
कर्तव्यनिष्ठों में एक सबसे बड़ा अवगुण ये होता है कि, उन्हें किसी के प्रसन्न या अप्रसन्न होने की फ़िक्र नहीं होती; उनकी केवल एक ही सोच होती है- 
"इस समय मेरा क्या काम बाकी है ?"
सामने वाले की ख़ुशी या नाराज़गी या भावनाओं से उसे कम वास्ता रहता है; इसी अवधारणा के  कारण उनके सम्पर्क में आने वाले या उनसे अपेक्षा रखने वाले अक्सर उनसे नाराज़ ही रहते हैं;    
इससे विपरीत प्रकार के लोग भरसक प्रयासरत रहते हैं  कि  - -
 रसूख़ न बिगड़ें !!
और वे अपनी मिलन-सारिता से रसूखों को जी जान से बनाये रखने के कारण वे शाबासी के पात्र बने रहते हैं; 
काम करने वाले को मीन-मेख का जवाब तो देना ही पड़ेगा -
निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय; 
बिनु साबुन, बिनु नीर के निर्मल करे सुभाय 
  


धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो
प्राणियों में सद्भाव हो; विश्व का कल्याण हो 
http://apnykhunja.blogspot.in/2010/08/justice.html
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गुरुवार, जून 07, 2012

सच

आज सुबह गरमा गर्म चाय के प्याले के साथ, अख़बार पढ रहा था; माननीय सभासदों के कार्टून के खिलाफ विशेषाधिकार की चुटीली खबर पूरी आत्मसात नहीं कर पाया था, कि यार तेजा आ धमका

बात व्यंग्य, कार्टून, विशेषाधिकार से होती हुई सहिष्णुता पर आ टिकी तो वह धीरे से डरते-डरते बोला यार हो तो तुम भी गुस्सैल ! मैंने फड़ाक से अख़बार उसके मुंह पर दे मारा; और कहा शर्म नहीं आती मेरे ही घर में आकर मुझपर झूठा दोषारोपण करते हो ; दफा हो जाओ यहाँ से !
वह बुदबुदाते हुए; जान बचाकर भागा -

निंदक नियरे राखिये; आँगन कुटी छंवाय;

बिनु साबुन, बिनु नीर के ; निर्मल करे सुभाय ;

पत्नी मेरी तरफ टेढ़ी नज़रों से देखने लगी

अब आप ही उसे समझाएं कि , झूठ बात को मैं सच कैसे मान लूं ?


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गुरुवार, मई 19, 2011

KAUN?

मैं युधिस्ठिर नहीं हूँ. 
 जो धर्म निर्वहन के लिए शांत और मौन रहकरअपने ऊपर हुए अत्याचार को सहन करता है  !
मैं भीष्म नहीं हूँ.  
जो अपनी प्रतिज्ञा में   बंध कर अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को कुचल कर अत्याचार का मूक दर्शक बना रहता है !!
मैं दुर्योधन नहीं हूँ.   
जो अपनी महत्वाकांक्षा के लिए अंतहीन अत्याचार का सिलसिला जारी रखता है !!!     
मैं धृतराष्ट्र   नहीं हूँ. 
जो अपने पुत्रमोह से आगे कुछ नहीं देख पता है !!!!
मैं कर्ण हूँ.
जो मित्रता और विरोध को मुखर होकर प्रकट करता है !!!!!
मैं विदुर बनना चाहता हूं;
जो मान-अपमान, लाभ-हानि, अपना-पराया से;
 ऊपर ऊठ कर बात करता है!!!!!

BE BOLD IN WHAT YOU STAND FOR !
JAIHIND

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